आंधियां चलतीं रहीं और दिए जलते रहे गर्दिशों में भी मुहब्बतों के कमल खिलते रहे शमा ये प्यार की न बुझी है न बुझेगी कभी जाने कितने परवाने जल के खाक होते रहे आंधियां चलतीं रहीं और दिए जलते रहे...... वो रोकने आए हमें जिनकी औकात ही क्या थी हम ठहरते क्यों भला ऐसी कोई बात ही क्या थी हम समझ पते जब तक सीनेपर तीर बरसते गये आंधियां चलतीं रहीं और दिए जलते रहे ........ - Bhanu pratap dwivedi https://www.yourquote.in/bhanupratap-dwivedi-bojqp/quotes/aandhiyaan-cltiin-rhiin-aur-die-jlte-rhe-grdishon-men-bhii-n-zw03s